Live The Moment

Sunday, 9 July 2017

खामोश मैं

खामोश मैं
खामोश मेरी सांसे भी..
न कुछ कह सकूँ
न कुछ सुन सकूँ...
जाना चाहूँ हर पल दूर तुमसे
मगर दूर भी न रह सकूँ..
क्यूँ पास आकर के
हम दूर हो गए...
क्या की खता हमने
कि मजबूर हो गए..
जो है सच
वो झूठ क्यूँ लगता है,
काँटा नही चुभा कोई
फिर दर्द क्यूँ उठता है...
कुछ तो बताओ
कुछ तो समझाओ
तुम अब क्यूँ मेरे पास आती नही...
तुम अब क्यूँ मुझे चिढाती नही...
होना न था जो वो हो गया है..
तेरे आने से जागा था जो ख्वाब
फिर आंसूओ के तकिये पर सो गया है।।
खामोश मैं
खामोश मेरी सांसे भी..
न कुछ कह सकूँ
न कुछ सुन सकूँ...





Wednesday, 5 July 2017

वादलों के दरमियां

आ तुझे लेकर चलूं
वादलों के दरमियां,
भिंगेंगे वहीं साथ मे
करेंगे कुछ मस्तियां।।
तुम मेरी हथेली पकड़
सुनाना अपनी कहानियां..
मैं तुम्हारी भींगी जुल्फों संग
करूँगा कुछ अठखेलियां।।
बैठेंगे वहीं वादलों पर
बनाकर उनकी कुर्सियां...
और खाएंगे फिर
वादलों की ही कुल्फियां..
हो जाए कितनी भी रात
छोड़ेंगे न वो पल वहीं रहेंगे,
लगेगी शर्दी जब
ओढ़ एक दूजे को सोते रहेंगे..
थाम लेना तुम मेरी धड़कनों को
हम तो तेरी सांसो में रहेंगे...
बन जाना तुम रूह मेरी...
हम तेरी उम्र बनेंगे...
होंगे न दूर कभी
रहेंगी हमेसा नज़दीकियां...
आ तुझे लेकर चलूं
वादलों के दरमियां,
भिंगेंगे वहीं साथ मे
करेंगे कुछ मस्तियां।।




Thursday, 29 June 2017

न भाजपा अच्छी, न कांग्रेस अच्छी -The Constitutional Truth

न भाजपा अच्छी
न कांग्रेस अच्छी
इन सबकी सियासत से कहीं ज्यादा
हमारी इंसानियत अच्छी।।
सत्ता के भूखे
ये ऐसे शिकारी है,
समझते पूरी जनता को भिखारी है...
न ये हमारे लिए लड़ना चाहते,
न ये हमारे लिए कुछ करना चाहते,
हालातों के ये खिलाड़ी
हम पर हुकूमत करना चाहते।।
सत्ता से दूर हो
तो दंगे ये करवाते,
फसलें ये जलवाते
झोपड़ियों में आग ये लगवाते..
सत्ता में हो काबिज
तो भूल के सारे चुनावी वादे
हमारी ही मांगो पर
लाठी ये चलवाते
गोली ये चलवाते...
हमको वांट
जाती और धर्म के नाम पर
सत्ता के गलियारों में
फिर पहुंच जाते...
न भाजपा अच्छी
न कांग्रेस अच्छी
इन दोनों की सियासत से कहीं ज्यादा
हमारी इंसानियत अच्छी।।

अगर इस सच से सहमत हैं, तो शेयर जरूर करें।




Monday, 26 June 2017

क्या होती रौशनी

मैं उसे
समझा रहा था,
कि क्या होती रौशनी,
वो पूंछने लगी
क्यूँ सितारों सी
रौशन नही मेरी ज़िंदगी...
मैं रहा
चुप चाप
खामोश कुछ देर तक...
फिर थाम के उसकी हथेली...
मैंने कहा
क्या करोगी
अगर चुरा लाऊँ मैं
सितारों से तुम्हारे लिए रौशनी...
क्या करोगी
अगर मुठ्ठी में दबा लाऊँ मैं
पहाड़ो से तुम्हारे लिए ताजगी...
वो मुस्कुराई
और फिर मेरी आंखों में आंखे डालकर
मुझसे कहने लगी
रहो बस तुम मेरी नज़रो के ही सामने...
जब भी पडूँ मुश्किलों में
रहना संग मेरे मुझे थामने...
और कुछ नही..
बस यही होगी मेरी ज़िंदगी...
मैं हंसा
और फिर भरकर उसे बाहों में
उससे कहने लगा..
तू ही तो है मेरी सुबह की रौशनी
तुझ से ही जुड़ी मेरी धड़कन
और मेरी ज़िंदगी...
रहना यूं ही मुस्कुराती तुम सदा...
दिल मे जो भी हो वो देना बता...
मैं हूँ यही
खड़ा तुम्हारे लिए ही सदा..
तुमसे ही है
मुझमें बर्फीले पहाड़ो सी वफ़ा..
पिघल के भी तुम्हारे लिए
नदिया सा बहता रहूंगा सदा...
मैं हूँ यही
खड़ा तुम्हारे लिए ही सदा..



Wednesday, 21 June 2017

When I Try- Best Love Poem- Poetry Of My Story

When I Try
To Talk With You
I Face Problems Few
Those Are Not New
But Something Strange
Between Me And You.


When I Try
To Know About You
I Get Information Few
They Dont Give Me Any Clue
But The Create A Relation
Between Me And You.

http//poertyofmystory.blogspot.com
http://lovingsoal.blogspot.com



Sunday, 18 June 2017

पिता - The Untold God

आज जब मैं पिता के बारे में लिखने बैठा, काफी वक्त तक सोचता रहा कि आखिर क्या लिंखु उनके बारे में कुछ ऐसा, जो मेरे इस तुच्छ जीवन को थोड़ा सा महान बना सके। काफी देर तक सोचता रहा, मगर कुछ लिख न सका, फिर अचानक से आंखों से आंसूओ का सिलसिला शुरू हुआ... और फिर मुझे लिखने का पूरा समंदर मिल गया....



तुमसे ही मिली मुझे मेरी पहचान...
तुमसे ही मिली मुझे मेरी जान....
तुम ही हो मेरा वो अस्तित्व
तुम से ही है जिसका सर्वाधिक महत्व....
निकलूं मैं हर सुबह ढूढूने खुदा...
खुदा भी हसने लगता मुझ पे
और फिर दे देता तुम्हारा ही पता...
ओ मेरे पिता
तुम ही तो हो मेरी सांसो की हवा..
ओ मेरे पिता
तुम ही तो हो मेरी पूरी होती दुआ...
तुम्हारी उंगलियां थाम
मैं चलने लगा..
तुम्हारे कांधे पर बैठ पूरी दुनिया
मैं देखने लगा...
मेरे भोजन का पहला टुकड़ा तुम..
मेरे जीवन का आखरी सपना तुम...
जो कह न सका कभी..
वो भी कहना चाहता...
मगर आंसूओ के साथ
तुम्हारे सामने आना नही चाहता...
मुझपर तुम्हारे एहसानों को
मैं क्या ईनाम दूं...
तुम्हारे बगीचे का मैं एक पौधा
तुम्हारे हर कर्म को खुदा का नाम दूं...
तुमसे ही मिली मुझे मेरी पहचान...
तुमसे ही मिली मुझे मेरी जान....
तुम ही हो मेरा वो अस्तित्व
तुम से ही है जिसका सर्वाधिक महत्व...
निकलूं मैं हर सुबह ढूढूने खुदा...
खुदा भी हसने लगता मुझ पे
और फिर दे देता तुम्हारा ही पता...



Friday, 9 June 2017

देखा उसे अपनी गली में

देखा उसे आज पहली दफा
अपनी गली में,
देखते ही उसे
दिल खोने लगा अपना विवेक...
सोचा दिल ने
उसके पास जाऊँ
और फिर उसे
अपने घर पर लाऊँ..
बिठाके उसको एक चेयर पर..
अपनी बातें सुनाऊँ
सिर्फ बातें ही नही
बनाकर चाय भी पिलाऊँ...
मगर दिमाग ने फिर एक दफा
लगा दिया दिल के अरमानों पर ब्रेक..
देखा उसे आज पहली दफा
अपनी गली में,
देखते ही उसे
दिल खोने लगा अपना विवेक...
सोचा दौड़कर
उसके पास मैं जाऊँ...
उसका हाल मैं पूंछूं
और उसे उसकी तारीफे मैं सुनाऊँ...
मुस्काती सड़क पर
चलती वो जाए...
उसे रोकने की कोशिश मैं करूँ
लेकिन जाने की जल्दी में वो
एक पल को भी रुक न पाए...
और फिर वो मान ही जाए
साथ मे मेरे वो
पानी के बतासे भी खाए..
मगर दिमाग ने फिर एक दफा
लगा दिया दिल के अरमानों पर ब्रेक..
देखा उसे आज पहली दफा
अपनी गली में,
देखते ही उसे
दिल खोने लगा अपना विवेक...




खामोश मैं

खामोश मैं खामोश मेरी सांसे भी.. न कुछ कह सकूँ न कुछ सुन सकूँ... जाना चाहूँ हर पल दूर तुमसे मगर दूर भी न रह सकूँ.. क्यूँ पास आकर के हम दूर हो...